भाद्रपद की पांच गते मनाने की सदियों पुरानी परंपरा, ऊन की छंटाई के बाद ऊंचाई वाले इलाकों की ओर बढ़ते हैं भेड़ पालक
रिपोर्ट : लक्ष्मण सिंह नेगी
ऊखीमठ/रुद्रप्रयाग। सुरम्य हिमालयी बुग्यालों में भेड़ पालकों का पारंपरिक लाई त्योहार धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया गया। भाद्रपद माह की पांच गते मनाया जाने वाला यह पर्व भेड़ पालक समुदाय की लोक संस्कृति, पारंपरिक पशुपालन और प्रकृति के साथ उनके गहरे जुड़ाव का प्रतीक है। त्योहार के अवसर पर बुग्यालों में दिनभर चहल-पहल रही। भेड़ पालकों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अपनी भेड़-बकरियों की ऊन की छंटाई की।
इन दिनों ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों के बुग्याल विभिन्न प्रजातियों के पुष्पों से खिले हुए हैं। चारों ओर फैली मखमली हरियाली और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच लाई त्योहार ने बुग्यालों की रौनक और बढ़ा दी। दूर-दराज के उच्च हिमालयी क्षेत्रों से भेड़ पालक अपने पशुधन के साथ बुग्यालों में पहुंचे और सामूहिक रूप से इस पारंपरिक पर्व को मनाया।
भेड़ पालक बीरेंद्र धिरवाण ने बताया कि लाई त्योहार उनके समुदाय के लिए विशेष महत्व रखता है। वर्षभर भेड़-बकरियों के पालन-पोषण में जुटे पशुपालक इस अवसर पर पशुओं की ऊन की छंटाई करते हैं। इसके बाद पशुओं की साफ-सफाई और देखभाल की जाती है। बदलते मौसम के अनुरूप पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी देखभाल की दृष्टि से भी यह परंपरा महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भेड़ पालक प्रेम भट्ट के अनुसार, लाई त्योहार केवल ऊन की छंटाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामूहिक जीवन, लोक परंपरा और आपसी मेल-मिलाप का पर्व भी है। बुग्यालों में एकत्र होकर भेड़ पालक एक-दूसरे से मिलते हैं और अपनी सदियों पुरानी परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं। इस दौरान नई पीढ़ी को भी बुजुर्गों से पारंपरिक पशुपालन और पहाड़ी जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं।
रघुवीर सिंह नेगी ने बताया कि लाई त्योहार के बाद भेड़ पालक एक बार फिर ऊंचाई वाले क्षेत्रों और बुग्यालों की ओर रुख करते हैं। गर्मियों में निचले क्षेत्रों से पशुधन के साथ बुग्यालों तक पहुंचने वाले इन पशुपालकों का जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर रहता है। बुग्यालों में उपलब्ध हरी घास उनके पशुधन के लिए प्रमुख चारे का स्रोत होती है।
उन्होंने बताया कि मौसम के अनुसार पशुधन के साथ स्थान परिवर्तन करने की यह परंपरा हिमालयी क्षेत्र की सदियों पुरानी पशुपालक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। भेड़ पालक कई महीनों तक दुर्गम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रहकर अपनी पारंपरिक आजीविका को आगे बढ़ाते हैं।
लाई त्योहार के बाद अब भेड़ पालकों का अगला पड़ाव ऊंचाई वाले बुग्याल होंगे। कई माह तक हिमालयी बुग्यालों में प्रवास करने के बाद वे दीपावली के आसपास अपने गांवों में लौटते हैं। इस तरह लाई त्योहार से लेकर दीपावली तक का समय उनके लिए पशुधन के साथ हिमालयी क्षेत्रों में प्रवास का महत्वपूर्ण दौर होता है।
ग्रामीण जगत सिंह पंवार ने कहा कि आधुनिक दौर में पशुपालन के तौर-तरीकों में भले ही बदलाव आया हो, लेकिन लाई त्योहार जैसी परंपराएं आज भी ग्रामीण संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं। ये पर्व नई पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं, पारंपरिक पशुपालन और प्रकृति से जुड़ी विरासत से परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
भेड़ पालक बिक्रम सिंह रावत ने कहा कि हिमालयी बुग्याल उनके लिए केवल पशुओं के चारागाह नहीं हैं, बल्कि उनकी संस्कृति, आजीविका और जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए बुग्यालों के संरक्षण के साथ-साथ लाई त्योहार जैसी पारंपरिक लोक संस्कृति और पशुपालक विरासत के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जाना
आवश्यक है।