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देव नृत्यों से गूंजेंगी मदमहेश्वर-तुंगनाथ घाटियां, धार्मिक मेलों में दिखेगा लोक संस्कृति का वैभव

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फापज-बरसाल में नाग नृत्य का शुभारंभ, रांसी और पर्यटक गांव सारी में गूंजेगी लोकनायक जीतू बगडवाल की अमर गाथा,

ऊखीमठ/रुद्रप्रयाग। मदमहेश्वर और तुंगनाथ घाटियों में शीतकालीन धार्मिक मेलों एवं पारंपरिक देव आयोजनों के साथ लोक संस्कृति के रंग बिखरने लगे हैं। घाटी के विभिन्न गांवों में आयोजित होने वाले नाग नृत्य, बगडवाल नृत्य और पांडव नृत्य से ग्रामीण अंचल देव आस्था और लोक परंपराओं से सराबोर होगा। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज, लोकगीतों की मधुर स्वर लहरियां और पौराणिक लोकगाथाओं की प्रस्तुतियां इन आयोजनों को खास बनाएंगी। 

 

इन आयोजनों के माध्यम से जहां ग्रामीण अपनी प्राचीन परंपराओं का निर्वहन करेंगे, वहीं उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश भी देंगे। मदमहेश्वर घाटी के फापज-बरसाल गांव में नाग नृत्य का शुभारंभ हो चुका है। इसके साथ ही क्षेत्र में पारंपरिक देव आयोजनों का सिलसिला शुरू हो गया है। नाग नृत्य स्थानीय धार्मिक आस्था और लोकविश्वासों से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपरा है। इस आयोजन से गांव में उत्सवी माहौल बनने लगा है। ग्रामीण सामूहिक सहभागिता के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने में जुटे हैं।

 

वहीं, भगवती राकेश्वरी की तपस्थली रांसी गांव में बगडवाल नृत्य का आयोजन किया जाएगा। लोक मान्यताओं और पारंपरिक गाथाओं से जुड़ा यह नृत्य क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीतों और वाद्य यंत्रों के माध्यम से प्रस्तुत होने वाली लोकगाथाएं पुरखों की स्मृतियों और लोकजीवन की परंपराओं को जीवंत करती हैं। इस आयोजन से ग्रामीणों के साथ ही क्षेत्र में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को भी स्थानीय संस्कृति को करीब से जानने का अवसर मिलेगा।

 

पर्यटक गांव सारी में भी लोकनायक जीतू बगडवाल की अमर गाथा का पारंपरिक प्रस्तुतियों के माध्यम से गायन किया जाएगा। उत्तराखंड की लोक संस्कृति में विशेष स्थान रखने वाली जीतू बगडवाल की गाथा लोकजीवन की संवेदनाओं, मान्यताओं और सांस्कृतिक स्मृतियों को अभिव्यक्त करती है। सारी गांव में होने वाला यह आयोजन धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को नई पहचान देने के साथ ही क्षेत्र की लोक परंपराओं को व्यापक स्तर पर सामने लाने में सहायक बनेगा।

 

नगर पंचायत अध्यक्ष श्रीमती कुब्जा धर्म्वाण ने कहा कि केदार घाटी में धार्मिक मेलों के साथ पांडव नृत्य, बगडवाल नृत्य और नाग नृत्य जैसी परंपराएं लंबे समय से लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा रही हैं। इन आयोजनों में धार्मिक आस्था, पौराणिक प्रसंगों और लोकविश्वासों की अनूठी झलक देखने को मिलती है। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप और ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी इन्हें विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है।

साहित्यकार दिनेश खोयाल ने कहा कि बदलते समय में भी लोक परंपराओं का जीवंत बने रहना क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना और लोकविश्वासों की मजबूती का प्रमाण है। 

 

वहीं, बुरूवा गांव के प्रधान मदन भट्ट ने कहा कि ऐसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इससे श्रद्धालुओं और पर्यटकों को हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता के साथ उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति को जानने-समझने का अवसर मिलेगा।

इन आयोजनों से मदमहेश्वर और तुंगनाथ घाटियों में धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति की छटा भी देखने को मिलेगी। देव नृत्यों और लोकगाथाओं के जरिए क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को सहेजने तथा नई पीढ़ी तक पहुंचाने की परंपरा आगे बढ़ेगी।