आस्था और लोक-संस्कृति का प्रतीक बनी ’फ्यूंली’
इनपुट : लक्ष्मण सिंह नेगी
रुद्रप्रयाग/ऊखीमठ। केदारघाटी की वादियों में इन दिनों पीले रंग की सुनहरी आभा बिखेरता फ्यूंली का फूल अपने पूर्ण यौवन पर है। पहाड़ों की ढलानों, खेत-खलिहानों की मेड़ों और गांवों की पगडंडियों के किनारे खिला फ्यूंली मानो प्रकृति के आगमन गीत का सजीव प्रतीक बन गया हो। शीत ऋतु की विदाई और बसंत के स्वागत का संदेश लेकर आने वाला यह नन्हा पुष्प स्थानीय जनजीवन, आस्था और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में फ्यूंली को शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। बसंत ऋतु के प्रारंभ में जब खेतों में नई फसल लहलहाने लगती है, तब घरों के आंगन में फ्यूंली के फूल लाकर देवस्थलों में अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि यह पुष्प देवी-देवताओं को प्रिय है और इसे अर्पित करने से परिवार में सुख-शांति एवं समृद्धि बनी रहती है। कई स्थानों पर चैत्र मास के आगमन पर फ्यूंली को घर की देहरी पर सजाकर नव वर्ष के स्वागत की परंपरा भी निभाई जाती है। लोककथाओं के अनुसार फ्यूंली त्याग, पवित्रता और स्नेह का प्रतीक है। यही कारण है कि इसे मात्र एक वनस्पति न मानकर श्रद्धा और भावनाओं से जोड़ा जाता है। पर्वतीय समाज की आस्था में यह फूल प्रकृति और ईश्वर के मधुर संबंध का प्रतीक बन गया है।
सांस्कृतिक जीवन में फ्यूंली
ऊखीमठ। फ्यूंली का उल्लेख उत्तराखंड के लोकगीतों और लोककथाओं में प्रमुखता से मिलता है। लोकगायन में “फ्यूंली खिली बग्वाल” जैसे पदों के माध्यम से बसंत के उल्लास और प्रेम भाव को अभिव्यक्त किया जाता है। विवाह, मांगलिक कार्यों और ऋतु पर्वों में भी फ्यूंली का सांकेतिक प्रयोग देखने को मिलता है। ग्रामीण अंचलों में बच्चे फ्यूंली के फूलों को चुनकर खेल-खेल में मालाएं बनाते हैं। महिलाओं की ओर से पारंपरिक गीतों में फ्यूंली का उल्लेख नवजीवन और आशा के रूप में किया जाता है। इस प्रकार यह पुष्प केवल प्रकृति का सौंदर्य नहीं, बल्कि लोक संस्कृति की आत्मा बन चुका है।
प्राकृतिक सौन्दर्य की अनुपम छटा
ऊखीमठ। फ्यूंली का फूल फरवरी-अप्रैल के मध्य अपने पूर्ण यौवन पर होता है। लगभग एक से डेढ़ फुट ऊँचा यह पौधा पतली टहनियों और कोमल पत्तियों के बीच चमकीले पीले फूलों से लदा रहता है। सूर्य की किरणें जब इन फूलों पर पड़ती हैं, तो पूरी पहाड़ी ढलान सुनहरे रंग से दमक उठती है। दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती ने पीली चादर ओढ़ ली हो। मधुमक्खियों और तितलियों के लिए भी यह पुष्प आकर्षण का केंद्र बना रहता है, जिससे जैव विविधता को भी बल मिलता है।
पर्यावरणीय संकेत और जैव विविधता
ऊखीमठ। फ्यूंली का समय पर खिलना पर्वतीय पारिस्थितिकी के संतुलन का संकेत माना जाता है। यह पौधा कम संसाधनों में भी पनप जाता है और मिट्टी के कटाव को रोकने में सहायक होता है। स्थानीय पर्यावरणविदों का मानना है कि फ्यूंली जैसे देशज पौधों का संरक्षण हिमालयी जैव विविधता के लिए अत्यंत आवश्यक है। हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के चलते पुष्पन चक्र में बदलाव की चर्चा भी सामने आती रही है।
पर्यटन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
ऊखीमठ। बसंत ऋतु में जब पर्यटक हिमालयी क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं, तो फ्यूंली की सुनहरी छटा उनके आकर्षण का केंद्र बन जाती है। केदारघाटी, ऊखीमठ और आसपास के ग्रामीण अंचलों में इन दिनों प्रकृति प्रेमी और फोटोग्राफर फ्यूंली के साथ यादगार तस्वीरें कैद करते नजर आते हैं। इससे स्थानीय पर्यटन गतिविधियों को भी बल मिलता है। ग्रामीण महिलाएं फ्यूंली के फूलों से पारंपरिक सजावट तैयार कर स्थानीय मेलों और उत्सवों में प्रस्तुत करती हैं, जिससे उनकी आजीविका को भी सहारा मिलता है।
संरक्षण की आवश्यकता
ऊखीमठ। प्रधान संगठन ब्लॉक महामंत्री मदन भट्ट ने कहा कि बढ़ते शहरीकरण, सड़कों के चौड़ीकरण और अनियंत्रित चराई के कारण फ्यूंली जैसे नाजुक पौधों का अस्तित्व प्रभावित हो सकता है। स्थानीय स्तर पर जनजागरूकता अभियान चलाकर इन देशज प्रजातियों के संरक्षण पर बल देने की आवश्यकता है। विद्यालयों और सामाजिक संगठनों की ओर से भी पौधारोपण एवं संरक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से इस दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं। पूर्व जिला पंचायत सदस्य रीना बिष्ट ने कहा कि फ्यूली का फूल केवल बसंत का अग्रदूत नहीं, बल्कि उत्तराखंड की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य का जीवंत प्रतीक है। इसकी सुनहरी आभा जहां मन को आनंदित करती है, वहीं यह हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने का संदेश भी देती है। आवश्यकता है कि आने वाली पीढ़ियां भी इस अनुपम धरोहर का सौंदर्य निहार सकें और इसकी महत्ता को समझ सकें।