देशभर के साथ ही देवभूमि उत्तराखंड में भी होली का उत्साह चरम पर है। गांव-शहर, मोहल्लों और बाजारों में रंग, उमंग और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। महिलाएं सज-धजकर बच्चों के साथ होलिका पूजन में जुटी हैं। पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजन के बाद होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन के दौरान भक्त प्रह्लाद की जय, होलिका माता की जय और नरसिंह भगवान की जय के उद्घोष से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
हरिद्वार जिले के लक्सर के मुख्य बाजार में वर्षों से होली पूजन का विशेष आयोजन किया जाता रहा है। यहां नगरवासी एकत्र होकर सामूहिक रूप से होलिका पूजन करते हैं। सामाजिक संगठन पहले से ही लकड़ियां इकट्ठा कर मोहल्लों और सार्वजनिक स्थलों पर होलिका की व्यवस्था करते हैं। महिलाएं विधि-विधान से पूजन कर परिवार की सुख-समृद्धि और बच्चों की दीर्घायु की कामना करती हैं। निर्धारित समय पर होलिका दहन किया जाता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। शास्त्रों के अनुसार, कथा है कि असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद की भगवान विष्णु में अटूट भक्ति से क्रोधित होकर अपनी बहन होलिका से उसे अग्नि में भस्म करने को कहा। होलिका को आग से न जलने का वरदान प्राप्त था, लेकिन श्रीहरि में प्रह्लाद के विश्वास के कारण वह सुरक्षित रहे और होलिका स्वयं जलकर राख हो गई। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है। इस वर्ष होली पर चंद्र ग्रहण का संयोग होने के कारण तिथियों में परिवर्तन किया गया है। लक्सर स्थित श्रीराम मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित दिनेश व्यास ने बताया कि 3 मार्च को चंद्र ग्रहण है, जिसका सूतक नौ घंटे पहले से प्रभावी रहेगा। ग्रहण दोपहर 3:15 बजे से शाम 6:47 बजे तक रहेगा। इसलिए होली पूजन 2 मार्च को किया जाएगा, जबकि होलिका दहन 3 मार्च को ग्रहण समाप्ति के बाद होगा। रंगभरी होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। प्रदेशभर में लोग इस पर्व को आपसी भाईचारे, प्रेम और सौहार्द के साथ मनाने की तैयारियों में जुटे हैं। होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि रिश्तों में मिठास घोलने का भी पर्व है।