सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम बना पर्व, सात गांवों में गूंजे पारंपरिक वाद्य यंत्र,
रुद्रप्रयाग। दुर्वाष्टमी (फरसो) के पावन अवसर पर मां चण्डिका मंदिर में पारंपरिक रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप भव्य मेले का आयोजन किया गया। पर्व पर मां चण्डिका गर्भगृह से बाहर पधारीं और श्रद्धालुओं को दर्शन एवं आशीर्वाद प्रदान किया। मां के फरश स्वरूप के दर्शन के लिए सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई। हजारों श्रद्धालुओं ने मां के दर्शन कर सुख-समृद्धि और क्षेत्र की खुशहाली की कामना की।
महाबन्याथ के उपरांत क्षेत्र के सात गांवों—बीरो, देवल, सांगुण, नैनि, पोंडर, क्यार्क और बरसूड़ी—में शुभ कार्यों के अवसर पर पारंपरिक वाद्य यंत्रों के वादन की परंपरा भी निभाई गई। ढोल-दमाऊं समेत पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोक संस्कृति की यह झलक मेले का विशेष आकर्षण रही।
मां चण्डिका की पूजा-अर्चना डिमरी एवं कंडपाल आचार्यों ने विधि-विधान के साथ संपन्न कराई। मंदिर से मां के बाहर पधारने के बाद श्रद्धालुओं ने कतारबद्ध होकर दर्शन किए और आशीर्वाद प्राप्त किया। दूर-दराज के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु सपरिवार मेले में पहुंचे।
आयोजन के दौरान पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह और भक्ति का माहौल बना रहा। डिमरी समाज के सदस्यों, मगनानंद डिमरी, बन्याथ समिति के अध्यक्ष डॉ. आशुतोष भंडारी समेत मंदिर समिति के पदाधिकारी, आचार्यगण और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
आयोजकों ने कहा कि दुर्वाष्टमी (फरसो) केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सदियों पुरानी आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। इस विरासत को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए परंपराओं को निरंतर संरक्षित किया जा रहा है।

