ज्योतिष-वास्तु के शास्त्रीय ज्ञान से आधुनिक समाज को दिशा देने पर जोर, रुद्रप्रयाग के भूतपूर्व छात्र डॉ. नवीन पाण्डेय ने नई दिल्ली में दिया शोधपरक व्याख्यान

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रुद्रप्रयाग के भूतपूर्व छात्र डॉ. नवीन पाण्डेय ने नई दिल्ली में दिया शोधपरक व्याख्यान

 

रुद्रप्रयाग। भारतीय ज्ञान-परंपरा के वैज्ञानिक, शास्त्रीय एवं व्यावहारिक पक्षों को समकालीन संदर्भों में समझने की दिशा में आयोजित चातुर्मास कार्यशाला में रुद्रप्रयाग के ग्राम धारी निवासी एवं श्री 108 स्वामी सच्चिदानन्द वेद भवन संस्कृत महाविद्यालय के भूतपूर्व छात्र डॉ. नवीन पाण्डेय ने शोधपरक व्याख्यान दिया। वर्तमान में डॉ. पाण्डेय श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के वास्तुशास्त्र विभाग में सहायक आचार्य हैं।

 

वेदव्यास संस्कृत गुरुकुल, श्रीकृष्ण धाम, वसंत कुंज, नई दिल्ली में आयोजित कार्यशाला में डॉ. पाण्डेय ने ज्योतिषशास्त्र एवं वास्तुशास्त्र का अन्तर्सम्बन्ध तथा सामाजिक उपयोगिता” विषय पर व्याख्यान देते हुए भारतीय ज्ञान-विधाओं के दार्शनिक, सांस्कृतिक एवं व्यावहारिक पक्षों पर प्रकाश डाला।

 

उन्होंने ज्योतिष को षड्वेदांगों में ‘वेद का चक्षु’ बताते हुए इसके तीन प्रमुख स्कंधों—सिद्धांत, संहिता और होरा—की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सिद्धांत ज्योतिष में आकाशीय एवं खगोलीय घटनाओं का गणितीय अध्ययन किया जाता है, जबकि संहिता ज्योतिष में देश, काल और क्षेत्र विशेष में होने वाली घटनाओं का विवेचन तथा होरा ज्योतिष में व्यक्ति-विशेष से जुड़े ज्योतिषीय संकेतों का अध्ययन किया जाता है।

 

वास्तुशास्त्र को बताया व्यापक ज्ञान-विधा

 

डॉ. पाण्डेय ने वास्तुशास्त्र को भारतीय स्थापत्य एवं पर्यावरणीय ज्ञान-परंपरा की स्वतंत्र और व्यापक विधा बताया। उन्होंने अथर्ववेद से संबद्ध स्थापत्यवेद की परंपरा का उल्लेख करते हुए सामुद्रिक शास्त्र, गणित, छंद, ज्योतिष, शिराज्ञान, शिल्पशास्त्र, यंत्रशास्त्र एवं कर्मविधान आदि के शास्त्रीय आधारों पर भी प्रकाश डाला।

 

उन्होंने कहा कि ज्योतिष एवं वास्तुशास्त्र परस्पर पूरक भारतीय ज्ञान-विधाएं हैं, जिनका मूल उद्देश्य मानव, प्रकृति, काल और परिवेश के बीच संतुलन एवं सामंजस्य स्थापित करना है। वर्तमान समय में इन विषयों के अध्ययन और अनुसंधान को प्रमाणिक ग्रंथों, तार्किक दृष्टिकोण तथा वैज्ञानिक विमर्श के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

 

वेदवेदान्त शोध संस्थान, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय एवं संस्कृत भारती, दिल्ली प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला में भारतीय शास्त्रीय परंपराओं, वैदिक ज्ञान-विज्ञान तथा उनके समकालीन सामाजिक सरोकारों पर विद्वानों द्वारा मंथन किया जा रहा है। डॉ. नवीन पाण्डेय के व्याख्यान की कार्यशाला में उपस्थित विद्वानों, आचार्यों एवं विद्यार्थियों ने सराहना की।