Aug 04, 2026

रासी गांव पौराणिक जागरों से गुंजायमान, दो माह तक गूंजती है देवी-देवताओं की महिमा,

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रिपोर्ट : लक्ष्मण सिंह नेगी 

ऊखीमठ/रुद्रप्रयाग। मद्महेश्वर घाटी स्थित भगवती राकेश्वरी की तपस्थली रासी गांव इन दिनों पौराणिक जागरों की स्वर-लहरियों से गुंजायमान है। देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, धार्मिक परंपराओं और लोकआस्था का अद्भुत संगम यहां प्रतिदिन देखने को मिल रहा है। राकेश्वरी मंदिर परिसर में आयोजित पौराणिक जागरों में स्थानीय ग्रामीणों के साथ दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल होकर देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं।

लोक परंपरा के अनुसार प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले इन जागरों में हरिद्वार से लेकर चौखंभा हिमालय तक विराजमान देवी-देवताओं, सिद्धों, ऋषि-मुनियों, लोकदेवताओं और शक्तिपीठों की महिमा का गुणगान किया जाता है। जागर गायक पारंपरिक ढोल-दमाऊं और अन्य लोक वाद्यों की थाप पर देवी-देवताओं के आवाहन, उनकी लीलाओं, तप, त्याग और लोककल्याण से जुड़ी कथाओं का गायन करते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

राकेश्वरी मंदिर समिति के कार्यकारी अध्यक्ष मदन भट्ट ने बताया कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत स्वरूप है। लगभग दो माह तक चलने वाले इन जागरों में प्रतिदिन आसपास के गांवों से भी श्रद्धालु शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि लोकगाथाओं के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, इतिहास और लोक परंपराओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य भी यह आयोजन करता है।

मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष जगत सिंह पंवार ने बताया कि जागर गायन के दौरान भगवान बदरी-विशाल, केदारनाथ, पंचकेदार, चौखंभा हिमालय, मां नंदा, राजराजेश्वरी, क्षेत्रपाल, भैरव, नागराजा सहित विभिन्न लोकदेवताओं की महिमा का विस्तार से वर्णन किया जाता है। श्रद्धालु इसे देवी-देवताओं से आध्यात्मिक संवाद का माध्यम मानते हैं।

शिक्षाविद रविन्द्र भट्ट ने बताया कि परंपरा के अनुसार आश्विन मास की दो गते को हिमालय से लाए गए पवित्र ब्रह्मकमल भगवती राकेश्वरी को अर्पित किए जाते हैं। इसी विशेष पूजा-अर्चना के साथ लगभग दो माह तक चलने वाले पौराणिक जागरों का विधिवत समापन होता है। इस अवसर पर हवन, विशेष पूजा, आरती और प्रसाद वितरण का आयोजन भी किया जाता है।

मुख्य जागरी पूर्ण सिंह पंवार ने बताया कि रासी गांव की यह परंपरा सदियों से निरंतर चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा एवं विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है। उनके अनुसार पौराणिक जागर उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, लोकसंगीत और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण का सशक्त माध्यम हैं। यही कारण है कि हर वर्ष इस आयोजन में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है और रासी गांव देवभक्ति, लोकआस्था और सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा

है।