Feb 14, 2026

कल महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर तय होगी केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि,

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धाम में महिश रूप में पूजे जाते हैं भगवान शिव, नर व देव पूजा की परंपरा,

द्वापर युग में पांडवों ने की थी मंदिर की स्थापना,

रिपोर्ट : प्रवीन रावत

रुद्रप्रयाग। विश्व प्रसिद्ध ग्यारहवें ज्योतिर्लिंग भगवान केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की शुभ तिथि कल महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर घोषित की जाएगी। शीतकालीन गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में पंचांग गणना के बाद विद्वान आचार्यों और हक-हकूकधारियों की उपस्थिति में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यह निर्णय लिया जाएगा। इस वर्ष की घोषणा इसलिए भी खास है, क्योंकि केदारनाथ धाम के नए रावल ’केदार लिंग’ के नाम की आधिकारिक घोषणा भी कल ही होनी है।

महाशिवरात्रि के अवसर पर ओंकारेश्वर मंदिर को भव्य रूप से सजाया गया है। बीकेटीसी ने आयोजन की सभी तैयारियां पूर्ण कर ली हैं। परंपरा के अनुसार, आज सुबह की विशेष पूजा-अर्चना के बाद मंदिर के कपाट खुलने का मुहूर्त सार्वजनिक किया जाएगा। इसके साथ ही बाबा की पंचमुखी डोली के धाम प्रस्थान का पूरा कार्यक्रम भी जारी होगा।

केदारनाथ धाम को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में ग्यारहवें ज्यातिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है। ग्रीष्मकाल के छह माह नर तो शीतकाल के छह माह में देवता भगवान केदारनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं। केदारनाथ धाम उत्तराखंड के चार धामों में से एक और पंच केदार में प्रथम केदार के रूप में पूजा जाता है। शीतकाल में केदारनाथ धाम में बर्फबारी होने के बाद कपाट छह माह के लिये कपाट बंद हो जाते हैं और शीतकालीन पूजा-अर्चना शीतकालीन गददीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में संपंन की जाती है।

मेरू-सुमेरू पर्वत की तलहटी के बीच केदार सिंह पर्वत और मंदाकिनी के तट पर भगवान केदारनाथ का भव्य मंदिर विराजमान है। मान्यता है कि द्वापर युग में पांडव गौत्र हत्या की मुक्ति से केदारनाथ धाम आये थे। भगवान शिव ने पांडवों को यहां महिष रूप में दर्शन दिये थे। जिसके बाद यहां पांडवों ने भगवान शिव के केदारनाथ के रूप में ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। मंदिर के गर्भ गृह में भगवान शिव का त्रिकोणीय आकार में शिव लिंग स्थित है। यह भी मान्यता है कि यह ज्योतिर्लिंग सतयुग का है और सतयुग में यहां नर-नारायण भगवान केदारनाथ की तपस्या करते थे। केदारनाथ धाम मंदाकिनी नदी का उदगम स्थल भी है। प्रत्येक वर्ष अप्रैल-मई माह में छह माह ग्रीष्मकाल के लिये भगवान केदारनाथ के कपाट आम भक्तों के दर्शनों के लिये खुले रहते हैं। जबकि शीतकाल में दीपावली के बाद भैयादूज के पर्व पर केदारनाथ के कपाट बंद किये जाते हैं।

 

नए रावल ’केदार लिंग’ संभालेंगे जिम्मेदारी

रुद्रप्रयाग। इस वर्ष की घोषणा इसलिए भी खास है क्योंकि केदारनाथ धाम के नए रावल केदार लिंग के नाम की आधिकारिक घोषणा की जानी है। रावल परंपरा के अनुसार धाम की पूजा पद्धति और धार्मिक व्यवस्थाओं का सर्वोच्च निर्वहन करते हैं। नए रावल की नियुक्ति को लेकर तीर्थ पुरोहितों और भक्तों में काफी जिज्ञासा और उत्साह बना हुआ है।

 

 

केदारनाथ के रावल : दक्षिण और उत्तर की अटूट आस्था का संगम,

रुद्रप्रयाग। भगवान केदारनाथ धाम की व्यवस्थाएं जितनी अलौकिक हैं, उतनी ही विशिष्ट यहां की पुजारी परंपरा है। धाम में पूजा-अर्चना का दायित्व निभाने वाले ’रावल’ भारतीय सांस्कृतिक एकता की एक जीवंत मिसाल हैं। परंपरानुसार, केदारनाथ धाम के रावल दक्षिण भारत के कर्नाटक के वीरशैव (लिंगायत) संप्रदाय से संबंध रखते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य की ओर से स्थापित परंपरा के अनुसार, सदियों से इसी संप्रदाय के विद्वान यहां मुख्य पुजारी के रूप में नियुक्त किए जाते हैं। कठिन नियमों का पालन रावल का पद केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि अत्यंत संयम का भी है। रावल का आजीवन अविवाहित होना अनिवार्य है। उनकी देखरेख और निर्देशों के अनुसार ही मंदिर की समस्त पूजा विधियां संपन्न होती हैं। कपाट खुलने और बंद होने के विशेष अवसरों पर रावल की उपस्थिति अनिवार्य होती है। उनके आशीर्वाद और विशेष पूजा के बाद ही धाम के द्वार आम भक्तों के लिए खोले जाते हैं।