May 31, 2026

महिला रामलीला के नवम् दिवस पर भक्ति, नीति और धर्म की अद्भुत प्रस्तुति, विभीषण शरणागति से अंगद-रावण संवाद तक गूंजा जय श्रीराम का उद्घोष,

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अगस्त्यमुनि/रुद्रप्रयाग।

अगस्त्यमुनि में वीरांगना संस्था की महिलाओं द्वारा आयोजित भव्य महिला रामलीला के नवम् दिवस पर धर्म, भक्ति और नीति का अनुपम संगम देखने को मिला। विभीषण निष्कासन, श्रीराम की शरणागति, रामेश्वरम् तीर्थ स्थापना, समुद्र पर सेतु निर्माण तथा अंगद-रावण संवाद जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों का अत्यंत जीवंत एवं भावपूर्ण मंचन किया गया।

 

 कलाकारों के प्रभावशाली अभिनय से पूरा पंडाल श्रद्धा और उत्साह से सराबोर हो उठा तथा "जय श्रीराम" के जयघोष देर रात तक गूंजते रहे।

कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य एवं विशिष्ट अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन तथा श्रीराम वन्दना के साथ हुआ। इस अवसर पर कीर्तन मण्डली विजयनगर की अध्यक्ष कमला अग्रवाल, कोषाध्यक्ष सुरमा अग्रवाल, सचिव मंजू माहेश्वरी, शकुन्तला देवी, जशोदा देवी एवं विशेश्वरी देवी चौधरी सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

 

रामलीला का आरम्भ उस मार्मिक दृश्य से हुआ, जिसमें हनुमान जी अशोक वाटिका से माता सीता का संदेश और चूड़ामणि लेकर प्रभु श्रीराम के समक्ष प्रस्तुत होते हैं। इसके बाद वानर सेना के समुद्र तट की ओर प्रस्थान का प्रभावशाली मंचन किया गया। रावण दरबार में विभीषण द्वारा धर्म और मर्यादा का पक्ष लेते हुए सीता माता को सम्मानपूर्वक लौटाने की सलाह देने का प्रसंग दर्शकों को भावुक कर गया। अहंकार में डूबे रावण ने अपने अनुज का अपमान कर उन्हें लंका से निष्कासित कर दिया। इसके उपरांत विभीषण का श्रीराम की शरण में आगमन और प्रभु द्वारा उन्हें ससम्मान स्वीकार कर लंकापति घोषित करने का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना।

 

रामेश्वरम् तीर्थ स्थापना का प्रसंग भी अत्यंत श्रद्धापूर्ण वातावरण में प्रस्तुत किया गया। श्रीराम के आदेश पर मंदिर निर्माण, रावण को पुरोहित के रूप में आमंत्रित करना, वैदिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना तथा रावण द्वारा श्रीराम को विजय का आशीर्वाद देने के दृश्य ने दर्शकों को भारतीय संस्कृति और धर्म की महानता का संदेश दिया।

इसके बाद नल-नील द्वारा समुद्र पर सेतु निर्माण का भव्य मंचन किया गया। वानर सेना के उत्साह, परिश्रम और जयघोष के बीच समुद्र पर बने सेतु से लंका की ओर प्रस्थान का दृश्य अत्यंत आकर्षक रहा।

नवम् दिवस का मुख्य आकर्षण अंगद-रावण संवाद रहा। शांति दूत के रूप में रावण दरबार पहुंचे अंगद ने उसे धर्म, नीति और मर्यादा का स्मरण कराते हुए माता सीता को लौटाने की अंतिम सलाह दी। रावण के अहंकारपूर्ण व्यवहार पर अंगद ने सभा के मध्य अपना चरण जमाकर चुनौती दी कि यदि कोई वीर है तो उसे हिलाकर दिखाए। रावण की पूरी सभा, योद्धाओं और इन्द्रजीत तक के प्रयास विफल रहे। अंततः जब स्वयं रावण आगे बढ़ा, तब अंगद ने चरण हटाते हुए कहा कि यदि झुकना ही है तो मेरे नहीं, तीनों लोकों के स्वामी प्रभु श्रीराम के चरणों में झुको। इस संवाद ने उपस्थित दर्शकों को रोमांचित कर दिया और पूरा पंडाल तालियों व जयघोष से गूंज उठा।

राम, लक्ष्मण, हनुमान, अंगद, विभीषण और रावण की भूमिकाओं का कलाकारों ने इतना सशक्त और सजीव अभिनय किया कि दर्शक भावविभोर हो उठे। मंच सज्जा और तकनीकी व्यवस्थाओं में भूपेन्द्र बेंजवाल, ललिता रौतेला, रजत थपलियाल, जीतेन्द्र रावत एवं ताजबीर विष्ट का योगदान विशेष रूप से सराहनीय रहा।

इस अवसर पर महिला रामलीला समिति की अध्यक्ष सावित्री देवी, शम्भूप्रसाद भट्ट, देवी प्रसाद भट्ट, राजेश बेंजवाल, प्रियधर मैठाणी, हीरा सिंह, अनीता राणा, सुमित्रा देवी कठैत, विजयपाल सिंह कठैत, उमेश काण्डपाल, महादेव मैठाणी, वासुदेव सेमवाल, दीपक बेंजवाल, कालिका काण्डपाल, सुनीता नेगी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। महिला कलाकारों द्वारा प्रस्तुत इस रामलीला ने न केवल धार्मिक आस्था को सशक्त किया, बल्कि समाज को धर्म, नीति, मर्यादा और सत्य के मार्ग पर चलने का प्रेरणादायी संदेश भी दिया।