देहरादून। उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने जनहित और कारोबार को सुगम बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए पुस्तकों की ओवरप्राइजिंग (निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली) और कालाबाजारी करने वाले दुकानदारों व प्रकाशकों पर शिकंजा कस दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में 'जन विश्वास एक्ट' के तहत संशोधन को मंजूरी दी गई है, जिसके तहत कई मामलों में जेल की सजा के प्रावधान को समाप्त या कम करते हुए आर्थिक जुर्माने को दस गुना तक बढ़ा दिया गया है। सरकार के इस फैसले से आम जनता और अभिभावकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
किताबों की कालाबाजारी करने और निर्धारित मूल्य से अधिक दाम वसूलने वाले कारोबारियों पर अब आर्थिक जुर्माने की सख्ती बढ़ाने की तैयारी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में जन विश्वास अधिनियम के तहत पांच कानूनों में संशोधन को मंजूरी दी गई। इसके तहत कुछ अपराधों में जेल की सजा घटाई जाएगी या हटाई जाएगी, जबकि जुर्माने की राशि बढ़ाई जाएगी। सरकार आगामी विधानसभा सत्र में द्वितीय उत्तराखंड जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026 को मंजूरी के लिए पेश करेगी। प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य सामान्य और प्रक्रियागत अपराधों में जेल की सजा के स्थान पर आर्थिक दंड की व्यवस्था करना है। हालांकि, किताबों की बिक्री रोकने या अधिसूचित मूल्य से अधिक कीमत वसूलने पर जुर्माने का प्रावधान पहले से अधिक सख्त होगा। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, कोई कारोबारी उपलब्ध किताबों की बिक्री नहीं रोक सकेगा और न ही अधिसूचित मूल्य से अधिक कीमत वसूल सकेगा। मौजूदा प्रावधान में ऐसे मामलों में एक से तीन साल तक जेल की सजा का प्रावधान है। संशोधन के बाद इस अपराध में जेल की सजा हटाने और अधिक वसूली गई रकम का दस गुना या अधिकतम दो लाख रुपये तक जुर्माना लगाने का प्रस्ताव है। यदि कोई दोषी व्यक्ति गलत बयान देता है, तो मौजूदा तीन साल तक की जेल की सजा को घटाकर छह महीने किया जाएगा। इसके साथ दो लाख रुपये तक जुर्माना या दोनों दंड दिए जा सकेंगे। इस बदलाव से किताबों की बिक्री और मूल्य निर्धारण में मनमानी रोकने के लिए आर्थिक दंड पर जोर रहेगा। लोक संपत्ति विरूपण निवारण अधिनियम में भी बदलाव प्रस्तावित है। सरकारी संपत्ति पर स्याही, खड़िया या मिट्टी आदि से विज्ञापन लिखने अथवा चिपकाने के मामले में एक साल की कैद घटाकर तीन महीने करने का प्रस्ताव है। वहीं, जुर्माना दोगुना कर 10 हजार रुपये से बढ़ाकर 20 हजार रुपये किया जाएगा। इसके अलावा, कोई कर्मचारी बिना उचित कारण अपने दायित्वों का उल्लंघन करता है, तो उससे संबंधित दंड व्यवस्था को सरल बनाने की संस्तुति की गई है। इस मामले को दंडनीय संज्ञेय अपराध की श्रेणी से बाहर करने का प्रस्ताव भी शामिल है। मत्स्य शिकार से जुड़े अपराधों में भी जुर्माना बढ़ाने की तैयारी है। प्रतिबंधित क्षेत्र में मछली पकड़ने पर एक हजार रुपये तक के स्थान पर पांच से दस हजार रुपये तक जुर्माना प्रस्तावित है। विस्फोटक से मछली मारने पर जुर्माना दो हजार से बढ़ाकर 20 हजार रुपये किया जाएगा। वहीं, जहर से मछली मारने के मामले में तीन साल की कैद या पांच हजार रुपये जुर्माने के मौजूदा प्रावधान को बदलकर दो महीने की जेल और 20 हजार रुपये जुर्माने का प्रस्ताव है। जल वितरण के कारोबार से जुड़े अपराध में एक साल की कैद घटाकर छह महीने करने का प्रस्ताव है। हालांकि, एक लाख रुपये तक जुर्माने और दूसरी बार अपराध करने पर प्रतिदिन 20 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान यथावत रहेगा। उधर, उत्तराखंड निवेश और आधारिक संरचना (विकास और विनियम) अधिनियम, 2023 में संशोधन को भी मंजूरी दी गई है। इसके तहत सार्वजनिक उपक्रमों, स्वायत्तशासी संस्थाओं, निगमों और परिषदों की संपत्ति के विनिवेश से मिलने वाली धनराशि का 92 प्रतिशत संबंधित संस्था को तथा शेष आठ प्रतिशत उत्तराखंड निवेश और आधारिक संरचना विकास बोर्ड (यूआईआईडीबी) को शुल्क के रूप में दिया जाएगा। प्रमुख सचिव नियोजन आर. मीनाक्षी सुंदरम के अनुसार, केंद्र सरकार के निर्देश पर विभिन्न अधिनियमों में सामान्य अपराधों के लिए निर्धारित जेल की सजा में संशोधन किया जा रहा है। इन बदलावों को लागू करने के लिए अब विधेयक को विधानसभा के समक्ष रखा जाएगा।

