Apr 24, 2026

भाजपा के कद्दावर नेताओं की पैरवी: क्या ऊर्जा विभाग में नियमों पर भारी पड़ेगी राजनीतिक सिफारिश?

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देहरादून। उत्तराखंड के ऊर्जा विभाग में इन दिनों 'रिटायरमेंट' से ज्यादा चर्चा 'एक्सटेंशन' की हो रही है। अभी एक महीना भी नहीं बीता जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कड़ा फैसला लेते हुए ऊर्जा निगमों के तीन 'शक्तिशाली' अधिकारियों का सेवा विस्तार खत्म कर उन्हें घर भेजा था। सरकार के उस फैसले को प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक बड़ी नजीर माना गया था, लेकिन अब उसी ऊर्जा विभाग में एक बार फिर एक अधिकारी को एक्सटेंशन दिलाने के लिए सिफारिशी चिट्ठियों का दौर शुरू हो गया है। इस ताजा घटनाक्रम ने राज्य में 'एक्सटेंशन कल्चर' पर एक नई बहस छेड़ दी है।

बीते महीने मुख्यमंत्री धामी ने उत्तराखंड जल विद्युत निगम के एमडी संदीप सिंघल, यूपीसीएल (UPCL) के एमडी अनिल यादव और निदेशक अजय अग्रवाल का सेवा विस्तार समाप्त कर स्पष्ट संदेश दिया था कि विभाग में नए खून और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जाएगी। लेकिन, अब किच्छा में तैनात एक उपखंड अधिकारी दिनेश चंद गुरुरानी के मामले ने सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुरानी आगामी 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, लेकिन उनकी विदाई से पहले ही उन्हें पद पर बनाए रखने के लिए फाइलें दौड़ने लगी हैं। हैरत की बात यह है कि इस सेवा विस्तार के लिए न केवल विभागीय स्तर पर सक्रियता दिख रही है, बल्कि भारी राजनीतिक पैरवी भी हो रही है। जानकारी के अनुसार, विभिन्न व्यापारी संगठनों के साथ-साथ नैनीताल सांसद अजय भट्ट ने भी इस अधिकारी के पक्ष में पत्र लिखा है। इसी पैरवी के आधार पर ऊर्जा निगम के निदेशक परिचालन एमआर आर्य ने मुख्य अभियंता से बाकायदा रिपोर्ट मांग ली है। चर्चा है कि विभाग के भीतर ही इस मामले को लेकर लिखा-पढ़ी इतनी तेज है कि मानो नियमावली से ज्यादा 'सिफारिश' भारी पड़ रही हो। ऊर्जा विभाग के कर्मचारी संगठनों ने इस कवायद का विरोध शुरू कर दिया है। कर्मचारियों का तर्क है कि जब एक ही पद पर रिटायर अधिकारी जमे रहेंगे, तो विभाग के युवा और ऊर्जावान अधिकारियों को पदोन्नति का अवसर कैसे मिलेगा? कर्मचारियों का कहना है कि बार-बार एक्सटेंशन देने से न केवल काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि निचले स्तर के कर्मियों का मनोबल भी टूटता है। सवाल यह भी है कि क्या किच्छा जैसे महत्वपूर्ण उपखंड में विभाग के पास कोई दूसरा सक्षम अधिकारी नहीं है, जिसके लिए एक ही व्यक्ति को बार-बार पद पर बनाए रखने की जिद की जा रही है? ऊर्जा विभाग में एक्सटेंशन की परंपरा पुरानी है। अक्सर अधूरी परियोजनाओं या 'विशेष अनुभव' का हवाला देकर चहेते अफसरों को कुर्सियों पर टिकाए रखा जाता है। पूर्व में भी कई अधिकारी सालों तक एक्सटेंशन की बैसाखी पर विभाग चलाते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में 'जीरो टॉलरेंस' की नीति पर चलना चाहती है, तो उसे इस 'सिफारिशी संस्कृति' को जड़ से खत्म करना होगा। अब सबकी नजरें सचिवालय और मुख्यमंत्री कार्यालय पर टिकी हैं। क्या राजनीतिक दबाव और सिफारिशों के आगे नियम बौने साबित होंगे या फिर सीएम धामी एक बार फिर अपनी सख्ती दिखाते हुए इस 'एक्सटेंशन कल्चर' पर ब्रेक लगाएंगे? यदि इस बार भी सिफारिश जीतती है, तो भविष्य में ऊर्जा विभाग के अन्य अधिकारी भी इसी तरह की पैरवी का सहारा लेकर सेवा विस्तार की राह पकड़ेंगे। उत्तराखंड में एक्सटेंशन की परंपरा प्रशासनिक गतिरोध का पर्याय बनती जा रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार सिफारिश को मानती है या फिर विभाग में नई ऊर्जा और पारदर्शिता के लिए नियमों पर अडिग रहती है।