Apr 24, 2026

चोपता–तुंगनाथ पैदल मार्ग पर सुविधाओं का टोटा, तीर्थयात्री परेशान

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शौचालय, पेयजल और प्रतिक्षालयों की कमी, बुग्यालों पर बढ़ता दबाव, संरक्षण की मांग तेज

 

इनपुट : लक्ष्मण सिंह नेगी 

 

 

रुद्रप्रयाग /ऊखीमठ। चोपता से तुंगनाथ मंदिर तक जाने वाले प्रसिद्ध पैदल मार्ग पर इन दिनों समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक आस्था के इस प्रमुख ट्रैक पर बुनियादी सुविधाओं के अभाव के चलते तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

 

सबसे बड़ी समस्या मार्ग पर शौचालयों और प्रतिक्षालयों की कमी की है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने के बावजूद पर्याप्त व्यवस्थाएं नहीं होने से लोगों को खुले में शौच के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इससे न केवल यात्रियों को असुविधा हो रही है, बल्कि पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

 

इसी के साथ क्षेत्र में पेयजल संकट भी गहराता जा रहा है। कई स्थानों पर जल स्रोत सूखने की कगार पर हैं, जिससे यात्रियों को पीने के पानी के लिए भटकना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बढ़ती भीड़ और जल स्रोतों के संरक्षण की अनदेखी के कारण हालात दिन-प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे हैं।

 

चोपता–तुंगनाथ मार्ग के आसपास फैले हिमालयी बुग्याल, जो पारिस्थितिकी के लिहाज से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं, अब मानव दबाव के कारण खतरे में हैं। अनियंत्रित आवाजाही, कूड़ा-कचरा और बढ़ती चराई से इन घास के मैदानों का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा है। पर्यावरण प्रेमी चन्द्र सिंह नेगी ने चेतावनी दी है कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो बुग्यालों की प्राकृतिक संरचना को स्थायी नुकसान हो सकता है। उन्होंने सीमित संख्या में पर्यटकों की अनुमति, प्रभावी कचरा प्रबंधन और सख्त निगरानी की जरूरत बताई।

 

स्थानीय ग्रामीणों और पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि पैदल मार्ग पर जल्द से जल्द शौचालय, प्रतिक्षालय और पेयजल की समुचित व्यवस्था की जाए। साथ ही बुग्यालों के संरक्षण के लिए ठोस नीति बनाकर उसका सख्ती से पालन कराया जाए।

 

इस संबंध में केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग, ऊखीमठ/गुप्तकाशी के रेंज अधिकारी विमल कुमार भट्ट ने बताया कि चोपता–तुंगनाथ–चंद्रशिला ट्रैक के आसपास फैले बुग्यालों के संरक्षण के लिए विभाग लगातार प्रयासरत है। उन्होंने बताया कि प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश करने वाले 40 पर्यटकों पर वन अधिनियम के तहत जुर्माना भी लगाया गया है।

 

स्थानीय निवासी अनिल जिरवाण का कहना है कि यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो न केवल तीर्थयात्रियों की आस्था प्रभावित होगी, बल्कि उत्तराखंड की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर भी गंभीर खतरे में पड़ सकती है।