Aug 13, 2026

बुग्यालों में गूंजा दाती पर्व का उल्लास, देव पूजन के साथ नियुक्त हुआ भेड़-बकरियों का सेनापति,

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छह माह तक ऊंच हिमालयी बुग्यालों में प्रवास करने वाले भेड़ पालकों ने श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया पारंपरिक लोकपर्व,

रिपोर्ट : लक्ष्मण सिंह नेगी

ऊखीमठ/रुद्रप्रयाग। ऊंच हिमालयी बुग्यालों में भेड़-बकरियों के साथ करीब छह माह तक प्रवास करने वाले पशुपालकों ने पारंपरिक दाती पर्व श्रद्धा, उल्लास और धार्मिक आस्था के साथ मनाया। सावन माह के अंतिम सप्ताह में मनाया जाने वाला यह लोकपर्व हिमालयी पशुपालक समाज की समृद्ध लोक संस्कृति, देव आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। इस अवसर पर पशुपालकों ने स्थानीय देवी-देवताओं की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर पशुधन की सुख-समृद्धि, सुरक्षा और कुशलता की कामना की। 

 

देव पूजन के बाद भेड़-बकरियों के झुंड के सेनापति की नियुक्ति की पारंपरिक रस्म भी निभाई गई। पशुपालक समाज में सेनापति को झुंड के संचालन और पशुधन की सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। पर्व के दौरान पशुपालकों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन करते हुए देवताओं से बुग्यालों में सुरक्षित प्रवास और पशुधन की रक्षा का आशीर्वाद मांगा। भेड़ पालकों के लिए ऊंच हिमालयी बुग्याल महज पशुओं के चरने का क्षेत्र नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली, आजीविका और लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। 

 

गर्मियों में निचले क्षेत्रों से भेड़-बकरियों के झुंड लेकर पशुपालक ऊंच हिमालयी बुग्यालों की ओर रवाना होते हैं और करीब छह माह तक वहीं प्रवास करते हैं। इस दौरान उनका जीवन प्रकृति, पशुधन और स्थानीय देव परंपराओं से गहराई से जुड़ा रहता है। भेड़ पालक वीरेंद्र धिरवाण ने बताया कि दाती पर्व पशुपालक समाज की प्राचीन परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण लोकपर्व है। प्रत्येक वर्ष सावन माह के अंतिम सप्ताह में ऊंच हिमालयी बुग्यालों में इसका आयोजन किया जाता है। बुजुर्ग पशुपालक नई पीढ़ी को पर्व की धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं से परिचित कराते हैं। देव पूजन और सेनापति नियुक्ति की परंपरा पशुधन की रक्षा तथा बुग्यालों में सुरक्षित प्रवास की मंगलकामना से जुड़ी है। आधुनिकता के दौर में जब कई पारंपरिक पर्व और लोक संस्कृतियां धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं, ऐसे में दाती पर्व जैसी परंपराएं हिमालयी पशुपालक समाज की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं। यह पर्व प्रकृति, पशुधन और देव आस्था के बीच सदियों से चले आ रहे आत्मीय संबंध को दर्शाता है। 

भेड़ पालक प्रेम भट्ट ने कहा कि दाती पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पशुपालक समाज की पहचान और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक इसी श्रद्धा और उत्साह के साथ पहुंचाना आवश्यक है। प्रधान संगठन के ब्लॉक महामंत्री मदन भट्ट ने कहा कि भेड़ पालकों का छह माह का हिमालयी प्रवास किसी साधना से कम नहीं है। संचार और ऊर्जा के आधुनिक युग में भी पशुपालक कई मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहकर कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में अपने पारंपरिक भेड़ पालन व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे हैं। 

उन्होंने प्रदेश सरकार और पशुपालन विभाग से भेड़ पालकों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष प्रोत्साहन राशि तथा ठोस कार्ययोजना तैयार करने की मांग की। दाती पर्व सावन माह के अंतिम सप्ताह में ऊंच हिमालयी बुग्यालों में मनाया जाता है। इस दिन पशुपालक स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर पशुधन की सुरक्षा और कुशलता की कामना करते हैं। इसके साथ ही भेड़-बकरियों के झुंड के सेनापति की नियुक्ति की पारंपरिक रस्म निभाई जाती है। प्रकृति, पशुधन और देव आस्था के त्रिवेणी संगम के रूप में मनाया जाने वाला यह पर्व हिमालयी पशुपालक समाज की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और सदियों पुरानी परंपराओं को आज भी जीवंत बनाए

हुए है।