Mar 10, 2026

क्या रुद्रप्रयाग में कानून बेबस है? टैक्सपेयर की जेब पर डाका और सिस्टम खामोश

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रूद्रप्रयाग। 

आस्था, अध्यात्म और हिमालय की पवित्रता के लिए पहचाना जाने वाला रुद्रप्रयाग आज एक असहज सवालों के घेरे में खड़ा है। जिस ज़िले से होकर करोड़ों श्रद्धालु केदारनाथ धाम की यात्रा करते हैं, वहीं सरकारी शराब की दुकानों पर खुलेआम ओवर-रेटिंग की शिकायतें आम हो चुकी हैं।

बोतल पर छपी एमआरपी कुछ और, वसूली कुछ और। 20–30 रुपये अतिरिक्त लेना अब “रूटीन” बताया जा रहा है। सवाल सिर्फ कुछ रुपयों का नहीं—सवाल है कानून की विश्वसनीयता का।

 

 

काकड़ागाड़ से तिलवाड़ा तक एक ही कहानी?

 

सबसे पहले मामला काकड़ागाड़ का सामने आया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में साफ दिखा कि प्रिंट रेट से अधिक कीमत वसूली जा रही है। शिकायतें सीएम पोर्टल तक पहुंचीं, जांच के आदेश भी हुए—लेकिन कार्रवाई? मौन।

अब तिलवाड़ा, नगरासू, मयाली, अगस्त्यमुनि और बसुकेदार तक यही आरोप दोहराए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ओवर-रेटिंग कोई अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है।

 

 

कानून की दो किताबें?

आम आदमी छोटी गलती करे तो चालान, मुकदमा, आर्थिक तबाही।

लेकिन ठेकेदार खुलेआम नियम तोड़ें तो खामोशी? यही विरोधाभास लोगों को “जंगलराज” कहने पर मजबूर कर रहा है। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में दिखें, तो भरोसा किस पर किया जाए?

 

 

आबकारी नीति बनाम जमीनी हकीकत–

 

उत्तराखंड सरकार की नई आबकारी नीति 2025-26 में स्पष्ट प्रावधान है कि एमआरपी से अधिक बिक्री पर लाइसेंस रद्द हो सकता है।

धार्मिक स्थलों के आसपास दुकानों पर सख्ती का निर्णय लिया गया है।

ओवर-रेटिंग और तस्करी के खिलाफ अभियान चलाने की बात कही गई है। लेकिन रुद्रप्रयाग में आरोपों की गंभीरता के बावजूद ठोस और पारदर्शी कार्रवाई क्यों नहीं दिख रही? क्या विभागीय मिलीभगत की आशंका निराधार है, या जांच की आंच अभी कमजोर है?

 

यात्रा मार्ग पर बढ़ती चिंता–

 

आगामी यात्रा सीजन से पहले यह मुद्दा और संवेदनशील हो जाता है। गुप्तकाशी, सोनप्रयाग और गौरीकुंड जैसे क्षेत्रों में पूर्व में अवैध भंडारण और ऊंचे दामों पर बिक्री के आरोप लगते रहे हैं। यदि यह सिलसिला जारी रहा तो यह न सिर्फ उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि राज्य की छवि पर भी प्रश्नचिह्न है।

 

अब जवाब कौन देगा?

जिला प्रशासन, आबकारी विभाग और राज्य सरकार के सामने सीधे सवाल खड़े हैं कि ओवर-रेटिंग पर अब तक कितने लाइसेंस रद्द हुए?

शिकायतों की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं? दोषियों पर दंडात्मक कार्रवाई कब? यह मुद्दा सिर्फ शराब बिक्री का नहीं, बल्कि जवाबदेही और न्याय की समानता का है।

 

रुद्रप्रयाग आस्था का प्रतीक है—क्या यहां कानून भी उतना ही पवित्र रहेगा, या कुछ हाथों में बंधक बना रहेगा?

जनता को अब आश्वासन नहीं, कार्रवाई चाहिए।