देहरादून। देश के विभिन्न हिस्सों में हाल ही में हुए दर्दनाक अग्निकांडों से सबक लेते हुए उत्तराखंड सरकार ने जनसुरक्षा को लेकर बेहद कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। दिल्ली के मालवीय नगर स्थित अस्पताल और लखनऊ के अलीगंज में हुए हादसों जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए राज्य सरकार ने उत्तराखंड में अग्नि सुरक्षा मानकों की निगरानी का पूरा सिस्टम बदल दिया है। अब इस मामले में अधिकारियों की सीधे तौर पर जवाबदेही तय कर दी गई है। गृह विभाग ने इस संबंध में सभी जिलाधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को लिखित रूप में विस्तृत और कड़े निर्देश जारी किए हैं।
गृह सचिव शैलेश बगोली की ओर से जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि अस्पतालों, नर्सिंग होम, कोचिंग संस्थानों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर अग्नि सुरक्षा मानकों का शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित कराया जाएगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह अभियान केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं होगा, बल्कि धरातल पर वास्तविक कमियों को दूर करने का एक ठोस प्रयास होगा। शासन ने इस विशेष चेकिंग अभियान को योजनाबद्ध तरीके से दो चरणों में संचालित करने का निर्णय लिया है। इस चरण के तहत जिलों में स्थित सभी सरकारी और निजी अस्पतालों, नर्सिंग होमों, मेडिकल कॉलेजों, डायग्नोस्टिक सेंटरों, शिक्षण केंद्रों, कोचिंग संस्थानों और छात्रावासों का संयुक्त टीमों द्वारा गहन भौतिक सत्यापन और निरीक्षण किया जाएगा। दूसरा चरण (व्यावसायिक और भीड़भाड़ वाले स्थल): पहले चरण की कार्रवाई पूरी होने के बाद दूसरे चरण में मॉल, मल्टीप्लेक्स, होटल, बैंक्वेट हॉल, सिनेमा हॉल, व्यावसायिक परिसरों और अन्य भारी भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थलों को रडार पर लिया जाएगा। सरकार ने इस अभियान की कड़ाई से मॉनिटरिंग के लिए एक स्पष्ट ढांचा तैयार किया है। प्रत्येक जिले में जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संयुक्त रूप से इस अभियान की साप्ताहिक समीक्षा करेंगे। यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है, तो संबंधित पक्षों की जिम्मेदारी तय की जाएगी। गृह विभाग ने निर्देश दिए हैं कि पहले चरण की कार्रवाई पूरी होने के बाद निर्धारित प्रारूप में अनुपालन रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर शासन और पुलिस मुख्यालय को अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाए। पुलिस मुख्यालय स्तर पर एक वरिष्ठ नोडल अधिकारी नामित किया जाएगा, जो सभी जिलों से प्राप्त रिपोर्टों का संकलन कर शासन को समेकित आख्या सौंपेगा। अब जिलों से आने वाली यह रिपोर्ट ही तय करेगी कि उत्तराखंड के सार्वजनिक स्थल सुरक्षा के पैमाने पर कितने खरे उतरते हैं।