Jul 15, 2026

16 जुलाई से रांसी गांव में गूंजेंगे पौराणिक जागर, दो माह तक भक्तिमय रहेगा मदमहेश्वर घाटी का वातावरण

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सावन संक्रांति से शुरू होगी सदियों पुरानी परंपरा, भगवती राकेश्वरी मंदिर में वेद मंत्रों और विशेष पूजा-अर्चना के साथ होगा शुभारंभ,

ऊखीमठ/रुद्रप्रयाग। देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं को जीवंत रखने वाली मदमहेश्वर घाटी एक बार फिर भक्ति के रंग में रंगने जा रही है। घाटी के रांसी गांव स्थित आराध्य भगवती राकेश्वरी मंदिर में आगामी 16 जुलाई सावन मास की संक्रांति से सदियों पुरानी पौराणिक जागर गायन परंपरा का विधिवत शुभारंभ होगा। विशेष पूजा-अर्चना, वैदिक मंत्रोच्चार और पंचनाम देवताओं के आवाहन के साथ आरंभ होने वाला यह धार्मिक अनुष्ठान लगातार दो माह तक चलेगा और आश्विन मास की द्वितीया को भगवती राकेश्वरी को ब्रह्मकमल अर्पित करने के साथ संपन्न होगा।

 

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा युगों से निरंतर चली आ रही है। सावन संक्रांति से प्रतिदिन सायं 7 बजे से 8 बजे तक मंदिर परिसर में पौराणिक जागरों का गायन किया जाता है। इन जागरों में भगवान शिव, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण सहित तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का स्मरण एवं आवाहन कर विश्व शांति, समृद्धि और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। दो माह तक पूरा रासी गांव और मदमहेश्वर घाटी भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर रहती है।

 

राकेश्वरी मंदिर समिति के कार्यकारी अध्यक्ष मदन भट्ट ने बताया कि इस वर्ष भी परंपरा के अनुरूप विशेष पूजा-अर्चना, वैदिक ऋचाओं और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जागर गायन का शुभारंभ किया जाएगा। इस अवसर पर ग्रामीण भगवती राकेश्वरी सहित पंचनाम देवी-देवताओं का आवाहन करेंगे तथा विभिन्न प्रकार के भोग अर्पित कर क्षेत्र और विश्व के कल्याण की कामना करेंगे।

 

मंदिर समिति के संरक्षक जगत सिंह पंवार ने बताया कि मदमहेश्वर घाटी में राकेश्वरी मंदिर ही एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां आज भी यह प्राचीन जागर परंपरा पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ जीवित है। यह परंपरा क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 

मंदिर समिति के सचिव दलीप रावत ने कहा कि दो माह तक चलने वाले इस आयोजन में रासी गांव सहित पूरी मदमहेश्वर घाटी के ग्रामीण उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। प्रतिदिन होने वाले जागर गायन से पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूबा रहता है और सामाजिक एकता भी मजबूत होती है।

 

शिक्षाविद् रवीन्द्र भट्ट ने बताया कि यह परंपरा युगों पुरानी है और ग्रामीण आज भी निस्वार्थ भाव से इसका निर्वहन कर रहे हैं। वहीं, वर्षों से जागर गायन से जुड़े पूर्ण सिंह पंवार ने बताया कि इन पौराणिक जागरों में भगवान शिव, श्रीराम और श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन किया जाता है तथा समस्त देवी-देवताओं का आवाहन कर मानव कल्याण की प्रार्थना की जाती है।

 

क्षेत्र पंचायत सदस्य रेशमा भट्ट ने कहा कि सुखद पहलू यह है कि अब युवा पीढ़ी भी इस लोक परंपरा से जुड़ रही है और जागर गायन में सक्रिय भागीदारी निभाकर इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प ले रही है।

 

तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित जीवंती देवी खोयाल ने बताया कि दो माह तक चलने वाले इस धार्मिक आयोजन में हरिद्वार से लेकर चौखंबा हिमालय तक विराजमान देवी-देवताओं का आवाहन कर विश्व शांति, समृद्धि और क्षेत्र की खुशहाली की कामना की जाती है। इस दौरान पूरी मदमहेश्वर घाटी आध्यात्मिक उल्लास और धार्मिक आस्था से ओत-प्रोत रहती है।

 

वहीं ज्येष्ठ प्रमुख राकेश नेगी ने प्रदेश सरकार और संस्कृति विभाग से मांग की कि रासी गांव में जीवित इस अद्वितीय पौराणिक जागर परंपरा के संरक्षण और संवर्धन के लिए विशेष योजना बनाई जाए। उन्होंने कहा कि यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, लोकसंगीत और आध्यात्मिक विरासत का अमूल्य धरोहर है, जिसे संरक्षित करना समय की आवश्यकता है।