Jun 17, 2026

धार्मिक गतिविधियों के लिए बाध्य करने वाले संस्थानों पर होगी एफआईआर: नई नियमावली में संकेत

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उत्तराखंड के शिक्षा और प्रशासनिक हलके से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर आ रही है। राज्य में आगामी 1 जुलाई से 'मदरसा बोर्ड' का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त होने जा रहा है। सरकार ने इसके समानांतर अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की मान्यता और संचालन के लिए नई नियमावली तो जारी कर दी है, लेकिन एक बड़ा पेंच अभी भी फंसा हुआ है। विभाग अब तक मान्यता और इसके नवीनीकरण (रिन्यूअल) के लिए लिया जाने वाला 'शुल्क' (फीस) तय नहीं कर पाया है. इस प्रशासनिक ढिलाई की वजह से सूबे के सैकड़ों शैक्षणिक संस्थानों के सामने आगे के संचालन को लेकर गहरा असमंजस बना हुआ है। 

आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में उत्तराखंड में कुल 450 पंजीकृत (रजिस्टर्ड) और लगभग 500 अपंजीकृत (गैर-पंजीकृत) मदरसे संचालित हो रहे हैं। अगले महीने जैसे ही मदरसा बोर्ड खत्म होगा, इन सभी 950 मदरसों सहित अन्य सभी अल्पसंख्यक मान्यता प्राप्त स्कूलों को अनिवार्य रूप से 'उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण' से नई मान्यता लेनी होगी। नई नियमावली के तहत, इन संस्थानों को न केवल एक बार मान्यता लेनी होगी, बल्कि हर तीन साल की अवधि पूरी होने पर इसका अनिवार्य रूप से नवीनीकरण (रिन्यूअल) भी कराना होगा। महानिदेशालय और विभाग की ओर से जो गाइडलाइंस आई हैं, उनके अनुसार अब मान्यता की पूरी प्रक्रिया को हाईटेक बनाया गया है। सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को मान्यता के लिए केवल ऑनलाइन माध्यम से ही आवेदन करना होगा। आवेदन के साथ ही तय शुल्क को डिजिटल रूप से ऑनलाइन जमा करना होगा। हालांकि, यह राशि कितनी होगी, इस पर अभी सस्पेंस है। डिजिटल आवेदन मिलने के बाद, प्राधिकरण अधिनियम की धारा 14 के तहत सभी शर्तों और क्रेडेंशियल्स की बारीकी से जांच करेगा। यदि स्क्रूटनी के दौरान प्राधिकरण को जरूरी लगा, तो वह इन शैक्षणिक संस्थानों का मौके पर जाकर भौतिक निरीक्षण (कमिटी विजिट) भी करवाएगा। सरकार ने साफ कर दिया है कि नई नियमावली के नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों को किसी भी सूरत में मान्यता नहीं दी जाएगी। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं। संस्थान अनिवार्य रूप से किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा ही स्थापित और संचालित होना चाहिए। शैक्षणिक संस्थान का संबंधित मान्यता प्राप्त शिक्षा परिषद से संबद्ध (अफ़िलिएटेड) होना आवश्यक है।  संस्थान परिसर के भीतर या बाहर ऐसा कोई भी कृत्य नहीं करेगा, जिससे सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक सद्भाव के मार्ग में कोई बाधा या ठेस पहुंचे। परिषद द्वारा निर्धारित योग्यताओं और पैमानों के अनुसार ही योग्य शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी। कोई भी संस्थान अपने छात्रों या कर्मचारियों को अपनी किसी भी प्रकार की विशेष धार्मिक गतिविधि या प्रार्थना में भाग लेने के लिए कतई बाध्य (मजबूर) नहीं करेगा। इस पूरे मामले पर अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के विशेष सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है, "अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों की मान्यता और नवीनीकरण के लिए अभी कोई निश्चित शुल्क तय नहीं हो सका है। विभाग इस पर काम कर रहा है और बहुत जल्द ही एक व्यावहारिक व पारदर्शी शुल्क ढांचा तय कर उसकी अधिसूचना जारी कर दी जाएगी।