Mar 13, 2026

शिक्षक विहीन स्कूलों का क्या होगा? भर्ती नियमों में सख्ती के बाद उत्तराखंड के दुर्गम स्कूलों में बढ़ी चिंता

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देहरादून। उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के खाली पदों पर भर्ती प्रक्रिया अब पहले की तरह सीधे नहीं हो सकेगी। राज्य सरकार ने नया आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि अब शिक्षकों के रिक्त पदों पर भर्ती से पहले वित्त और कार्मिक विभाग की सहमति लेना अनिवार्य होगा। शासन की ओर से यह आदेश शिक्षा महानिदेशक को जारी किया गया है, जिसके बाद शिक्षा विभाग में नई भर्ती प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हो गई है। शासनादेश के अनुसार, पहले विभिन्न शासनादेशों के माध्यम से छात्र संख्या के आधार पर माध्यमिक और प्रारंभिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों के पद सृजित किए गए थे। हालांकि हाल ही में वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट की समीक्षा के दौरान यह सामने आया कि प्रदेश के कई सरकारी स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या लगातार घट रही है। इसके कारण कई स्थानों पर शिक्षकों के पद जरूरत से अधिक हो सकते हैं।इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए सरकार ने निर्णय लिया है कि अब किसी भी नई भर्ती से पहले वित्त और कार्मिक विभाग को विस्तृत प्रस्ताव भेजा जाएगा। इस प्रस्ताव में संबंधित स्कूलों में स्वीकृत शिक्षकों के पदों की संख्या, वर्तमान में कार्यरत शिक्षकों का विवरण और वहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की वास्तविक संख्या का पूरा ब्यौरा देना होगा। इसके साथ ही प्रस्तावित भर्ती का औचित्य और उससे पड़ने वाले वित्तीय व्ययभार की जानकारी भी अनिवार्य रूप से देनी होगी। इस संबंध में शिक्षा महानिदेशालय के अपर निदेशक पदमेंद्र सकलानी ने निदेशक माध्यमिक शिक्षा को पत्र जारी कर नई व्यवस्था के अनुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह कदम संसाधनों के बेहतर उपयोग और वित्तीय अनुशासन को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।

प्रदेश में सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के कई स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या तेजी से घट रही है। हालात यह हैं कि करीब तीन हजार से अधिक स्कूल ऐसे हैं जहां छात्र संख्या बेहद कम हो गई है। कई स्कूलों में छात्रों की संख्या दस या उससे भी कम रह गई है, जिसके चलते ऐसे स्कूल बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। इस बीच शिक्षक संगठनों ने सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। राजकीय शिक्षक संघ के पूर्व प्रांतीय महामंत्री डॉ सोहन माजिला ने कहा कि शिक्षा विभाग में पहले ही शिक्षकों के लगभग 2600 पद समाप्त किए जा चुके हैं और अब कुछ अन्य पदों को भी खत्म करने की तैयारी की जा रही है। उनका आरोप है कि यह सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने की साजिश है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। इसके पीछे निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या, पलायन और शहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ता रुझान प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को अधिक संतुलित और व्यावहारिक बनाना है, ताकि जहां वास्तव में शिक्षकों की आवश्यकता है, वहीं पदों को भरा जा सके। वहीं शिक्षक संगठनों का कहना है कि यदि भर्ती प्रक्रिया को और जटिल बनाया गया तो पहले से ही शिक्षक की कमी झेल रहे स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था और प्रभावित हो सकती है।