उत्तराखंड। खनन व्यवस्था को लेकर एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। राज्य में खनन पट्टाधारियों, खनन विभाग, राजस्व विभाग, पुलिस, वन विभाग और डंपर मालिकों के बीच कथित तौर पर ऐसा मजबूत गठजोड़ बन चुका है, जिसके चलते सरकार को रेत, बजरी और पत्थर के परिवहन से मिलने वाले राजस्व में रोज़ाना लाखों और सालाना करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है। यह मामला अब सिर्फ अवैध खनन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
‘रमाना’ बना घोटाले का सबसे बड़ा हथियार–
नियमों के अनुसार खनन सामग्री के प्रत्येक वाहन पर उसकी क्षमता के अनुरूप रॉयल्टी (रमाना) अनिवार्य है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है।
सूत्रों और स्थानीय जानकारों के अनुसार—
5 घन मीटर क्षमता वाले डंपर पर केवल 3 घन मीटर का रमाना
10 घन मीटर क्षमता वाले डंपर पर महज 5 घन मीटर का रमाना
यानी हर डंपर से 2 से 5 घन मीटर तक की सामग्री बिना रॉयल्टी के परिवहन की जा रही है। यह सीधे-सीधे सरकारी राजस्व की चोरी है।
ओवरलोड डंपर, लेकिन चेक-पोस्ट पर ‘सब ठीक’–
राज्य की सड़कों पर ओवरलोड डंपरों की भरमार है, लेकिन चेक-पोस्ट पर निगरानी लगभग नाममात्र की रह गई है।
सूत्रों का दावा है कि पुलिस और वन विभाग के कुछ अधिकारी बिना जांच वाहनों को आगे बढ़ने देते हैं। बदले में नियमित “सेटिंग” की जाती है। शिकायत करने वालों को दबाया या साइडलाइन किया जाता है
यह स्थिति साफ इशारा करती है कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित तंत्र है।
पर्यावरण को भारी नुकसान, बढ़ता बाढ़ का खतरा–
अवैध और अति-खनन का असर सिर्फ राजस्व तक सीमित नहीं है।
नदियों की तलछट तेजी से खत्म हो रही है। नदी तंत्र कमजोर हो रहा है
बाढ़ और भू-कटाव का खतरा बढ़ता जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति जारी रही तो इसके परिणाम भयावह हो सकते हैं।
राजस्व बढ़ने के दावे, लेकिन सवाल बरकरार–
सरकार द्वारा पिछले वर्षों में खनन राजस्व 300 करोड़ से बढ़कर 1200 करोड़ तक पहुंचने के दावे किए गए हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि— यदि अंडर-रिपोर्टिंग और अवैध परिवहन पर लगाम लगाई जाती, तो वास्तविक राजस्व इससे कहीं अधिक हो सकता था। इससे यह सवाल उठता है कि कागज़ों में बढ़ा राजस्व, जमीनी हकीकत में क्यों कमजोर दिखता है?
अब सुझाव नहीं, सख्त कार्रवाई की जरूरत–
विशेषज्ञ और सामाजिक संगठनों की मांग है कि सभी डंपरों में GPS और वेइंग मशीन अनिवार्य की जाए। चेक-पोस्ट पर CCTV और लाइव मॉनिटरिंग सिस्टम लगाया जाए। रमाना प्रणाली को पूरी तरह डिजिटल और ऑटोमेटेड किया जाए। दोषी अधिकारियों और पट्टाधारियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो
बड़ा सवाल–
जब हर विभाग को सब कुछ दिखाई दे रहा है, तो फिर यह खेल रुक क्यों नहीं रहा? यदि समय रहते इस कथित महा-गठबंधन को नहीं तोड़ा गया,
तो उत्तराखंड की नदियां भी खतरे में रहेंगी और सरकारी खजाना भी।